मारवाड़ के राव चन्द्र सेन राठौड़ महाराणा प्रताप के पथप्रदर्शक

राव चंद्रसेन राठौड़ (1562 से 1581 ई.)


राव मालदेव ने अपने जेष्ठ पुत्र राम से अप्रसन्न होकर इसे राज्य से निष्कासित कर दिया, जिस पर वह केलड़ा (मेवाड़) में जाकर रहने लगा। उसके छोटे भाई से भी उसकी पटरानी नाराज हो गई जिससे उसे राज्य अधिकार से वंचित रखा गया और उसे जागीर देखकर फलोदी भेज दिया गया। अतएव पिता की मृत्यु पर 1562 ईस्वी में चंद्रसेन जो तीसरा पुत्र था, मारवाड़ का शासक बना। सरदारों ने चंद्रसेन का विरोध किया। बताया जाता है कि चंद्रसेन ने आवेश में आकर एक चाकर को मरवा डाला। इस घटना से राठौड़ पृथ्वीराज तथा अन्य सरदार बड़े बिगड़े। चंद्रसेन को दंड देने के लिए उसके भाइयों का गठबंधन किया और राम, उदय सिंह तथा रायमल को आमंत्रित किया कि वे चंद्रसेन का विरोध करें।

लोहावट का युद्ध : उदयसिंह ने चंद्रसेन से लोहावट में मुकाबला किया। वहां चंद्रसेन की बरछी का वार उदयसिंह पर हुआ। जिसके फलस्वरूप वह घोड़े से गिर गया उसके साथी उसे किसी तरह घटनास्थल से बचा कर ले गए। इस लड़ाई में उदय सिंह के कई प्रमुख सहयोगी सरदार मारे गए और विजय चंद्रसेन की रही।

अकबर के अधिकार में जोधपुर का जाना : लगभग 1564 ईस्वी में चंद्रसेन का सौतेला भाई राम अकबर के दरबार में पहुंचा और शाही सहायता की प्रार्थना की। अकबर अवसर की ताक में था ही। उसने शीघ्र ही हुसैन कुली खां की अध्यक्षता में एक फौज भेज दी जिसने जोधपुर पर अपना कब्जा कर लिया। विवश होकर चंद्रसेन भाद्राजूण के किले की तरफ चल दिया।
नागौर दरबार (1570 ईस्वी) :  जोधपुर छूटने के बाद राव चंद्रसेन की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी। अकबर के पास इन स्थितियों की खबर पहुंचती रहती थी। वह 1570 ईस्वी में अजमेर यात्रार्थ आया हुआ था कि उसने मारवाड़ के इलाकों में दुष्काल की खबर सुनी। वह 3 नवंबर 1570 में नागौर पहुंचा और वहां उसने कुछ समय रहने का निश्चय किया। दुष्काल से राहत दिलाने के लिए उसने अपने सैनिकों से एक तालाब खुदवाना आरंभ किया जिसका नाम शुक्र तालाब था। अकबर ने उधर मेवाड़ के विरुद्ध कार्यवाही करने की योजना बना ली थी। यहां के कई नरेश जिनमें बीकानेर और जैसलमेर के नरेश मुख्य थे, अकबर से मिलने को पहुंचे।
आमेर द्वारा जो वैवाहिक संबंध का सिलसिला आरंभ हो गया था उसके पद चिन्हों पर चलकर बीकानेर तथा जैसलमेर के शासकों ने अकबर से वैवाहिक संबंध जोड़े। राव चंद्रसेन, उदय सिंह, राम आदि भी अपनी स्थिति सुधारने के लिए वहां उपस्थित हुए। चंद्रसेन भी अकबर के दरबार में उपस्थित हुआ। चंद्रसेन ने देखा कि अकबर एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के विरुद्ध खड़ा कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है, वह अकबर के दरबार से चल दिया। वह अपने जेष्ठ पुत्र रायसिंह को अकबर की सेवा में छोड़कर पुनः भाद्राजूण लौट आया। मारवाड़ की परतंत्रता की कड़ी में नागौर दरबार एक बहुत बड़ी कड़ी है। जो नरेश नागौर आए थे एक प्रकार से आश्रित और समर्थकों की संख्या में गिने जाने लगे। जो नरेश यहां के दरबार में उपस्थित नहीं हुए थे उनकी मनोवृत्ति का समुचित रूप से परीक्षण हो गया। अकबर से जो वैवाहिक संबंध हुआ था उससे भी अधिक महत्व नागौर दरबार का था। यहां से राजपूतों का स्पष्ट वर्गीकरण मुगल विरोधी और मित्र राज्य के रुप में हो गया।
मारवाड़ की राजनीतिक स्थिति नागौर दरबार के बाद स्पष्ट थी। अकबर ने बीकानेर के रायसिंह को जोधपुर का अधिकारी नियुक्त कर महाराणा कीका को मारवाड़ से सहायता मिलने या इस मार्ग से गुजरात में हानि पहुंचाने की संभावना समाप्त कर दी। उदयसिंह को सामावली पर अधिकार करने की आज्ञा देकर अकबर ने उसे अपनी ओर मिला लिया तथा उधर से होने वाले गुर्जरों के उपद्रवों को कम करने का उपाय ढूंढ निकाला। राम को जो वास्तव में मारवाड़ का हकदार था, अपने पैतृक राज्य से अलग रखने के लिए शाही सेना के साथ कर दिया गया, जो सेना मिर्जा बंधुओं को दबाने के लिए नियुक्त थी। इस प्रकार अकबर ने अलग-अलग अधिकारियों के स्वार्थ निश्चित कर जोधपुर पर शाही अधिकार स्थापित कर दिया।

चंद्रसेन का विरोध और मुगल : 1565 में जोधपुर के परित्याग के बाद चंद्रसेन ने कुछ समय तो भाद्राजूण में रहकर मुगलों की फौजों का मुकाबला किया, परंतु जब मुग़ल अधिकारियों के जत्थों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया तो वहां से हट कर उसने सिवाना में अपना मोर्चा बनाया। सिवाना का गढ़ और पहाड़ी भाग दुर्गम थे। वहां जब चंद्रसेन का पता न लगा तो मुग़ल अधिकारियों ने उसके समर्थकों को समाप्त करने का प्रयत्न किया, ऐसे समर्थकों में सोजत का कला था। रावल, सुखराज, सूजा तथा देवीदास भी चंद्रसेन के साथी थे। चंद्रसेन के विरुद्ध सिवाना में भी सभी मुगल शक्ति लगा दी गई जिससे तंग आकर रामपुरा के पहाड़ों में जा रहा। सिवाना से निकलकर चंद्रसेन काणूजा के पहाड़ों में चला गया और आसपास लूट-खसोट आरंभ कर दी। यहां रहते हुए उसने आसरलाई और जोधपुर के महाजनों से दबाकर धन लेना आरंभ कर दिया। इस नीति से मारवाड़ में लोग अप्रसन्न हो गए। ऐसी स्थिति में उसने मारवाड़ छोड़कर भूडाड और फिर सिरोही और तदन्तर डूंगरपुर और बांसवाड़ा की शरण ली। वहां से सिचियाई के पहाड़ों की ओर निकल गया, जहां 11 जनवरी 1581 को उसका देहांत हो गया।
राव चंद्रसेन ऐसा प्रथम राजपूत शासक था जिसने अपनी रणनीति में दुर्ग के स्थान पर जंगल और पहाड़ी क्षेत्र को अधिक महत्व दिया था। खुले युद्ध के स्थान पर छापामार युद्ध प्रणाली का महत्व स्थापित करने में मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह के बाद चंद्रसेन राजपूताने का दूसरा शासक था। इस प्रणाली का अनुसरण महाराणा प्रताप ने भी किया था। राव चंद्रसेन को महाराणा प्रताप का पथ प्रदर्शक माना जाता है इसलिए राव चंद्रसेन को मारवाड़ का प्रताप कहा जाता है। जोधपुर राज्य की ख्यात के अनुसार चंद्रसेन व महाराणा प्रताप कोरड़ा गांव में मिले। राव चंद्रसेन ऐसा अंतिम राठौड़ शासक था जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की, बल्कि कष्टों का मार्ग अपनाया। तत्समय राजपुताने में महाराणा प्रताप और राव चंद्रसेन यही दो स्वाभिमानी वीर अकबर की आंखों के कांटे बने थे।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *